एप्स्टीन फाइल्स 2025: मोदी, हरदीप पुरी और दीपक चोपड़ा का नाम – कल बड़ा खुलासा, पूरी कहानी
जेफ्री एप्स्टीन घोटाला – धन, सत्ता और अपराध की एक वैश्विक कहानी – दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहा है। लेकिन भारत में 2025 में यह मामला और करीब आ गया है, क्योंकि नई रिलीज हुई फाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और भारतीय मूल के वेलनेस गुरु दीपक चोपड़ा जैसे प्रमुख नामों का जिक्र आया है। इन उल्लेखों ने भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय प्रभाव, पारदर्शिता और भारतीय नेतृत्व की साख पर सवाल उठ रहे हैं। कल, 19 दिसंबर 2025 को एप्स्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट के तहत अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जांच दस्तावेजों की बड़ी रिलीज होने वाली है, जिससे भारत की राजनीति में हलचल मच गई है।
एप्स्टीन घोटाले का भारत की राजनीति पर प्रभाव, जो सभी दलों में बहस छेड़ रहा है।
एप्स्टीन का बैकग्राउंड: वैश्विक शिकारी जिसकी जड़ें भारत तक पहुंचीं
जेफ्री एडवर्ड एप्स्टीन का जन्म 1953 में न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में हुआ था। वह सामान्य पृष्ठभूमि से उठकर अरबों डॉलर के अमीर फाइनेंशियर बने। एक एलीट स्कूल में पढ़ाने से लेकर लेस्ली वेक्सनर जैसे अरबपतियों के लिए काम करने तक का उनका सफर रहस्यमयी रहा। उनके पास शानदार संपत्तियां और निजी जेट था, जो दिग्गजों को ले जाता था।
एप्स्टीन के अपराध मुख्य रूप से अमेरिका में केंद्रित थे – नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण और तस्करी। लेकिन उनका नेटवर्क दुनिया भर में फैला था। भारत में फोकस अपराधों पर नहीं, बल्कि भारतीय एलीट्स से उनके संपर्कों पर है, जो कूटनीति और व्यापार को प्रभावित कर सकते थे।
लिटिल सेंट जेम्स द्वीप का हवाई दृश्य – एप्स्टीन का निजी द्वीप, जिसे मीडिया में ‘पेडोफाइल आइलैंड’ कहा जाता है।
अपराध और सजाएं: शोषण का पैटर्न
एप्स्टीन ने दर्जनों नाबालिग लड़कियों को ‘मसाज’ के बहाने यौन शोषण किया, जिसमें छिपे कैमरे कथित तौर पर ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल होते थे। 2008 में विवादास्पद समझौते से उन्हें कम सजा मिली।
भारतीय नजरिए से यह घोटाला वैश्विक नेटवर्क्स की कमजोरियों को उजागर करता है, जहां शक्तिशाली भारतीय अनजाने में फंस सकते थे। कोई भारतीय पीड़िता सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई, लेकिन खुलासे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जांच को जन्म दे रहे हैं।
गिरफ्तारी, मौत और रहस्य
2019 में सेक्स ट्रैफिकिंग के आरोप में गिरफ्तारी के बाद एप्स्टीन की जेल में मौत हो गई, आधिकारिक रूप से आत्महत्या। लेकिन कैमरा खराबी और अन्य अनियमितताओं से साजिश के सिद्धांत उभरे। 2025 में नई एफबीआई फुटेज ने आत्महत्या की पुष्टि की।
भारत में यह न्याय व्यवस्था पर बहस छेड़ता है, खासकर फाइल्स के प्रभाव से।
भारतीय कनेक्शन: मोदी से पुरी और चोपड़ा तक
एप्स्टीन की ‘ब्लैक बुक’ और ईमेल्स में भारतीय दिग्गजों से संपर्क की कोशिश दिखती है। मुख्य बिंदु:
- नरेंद्र मोदी और स्टीव बैनन: 2019 में एप्स्टीन ने मोदी और ट्रंप के पूर्व स्ट्रैटेजिस्ट स्टीव बैनन के बीच मीटिंग सेट करने की कोशिश की। ईमेल में “मोदी ऑन बोर्ड” का जिक्र, हालांकि मीटिंग नहीं हुई। इससे विदेशी प्रभाव पर सवाल उठे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी – एप्स्टीन ने बैनन से उनके साथ मीटिंग फिक्स करने की कोशिश की।
- हरदीप सिंह पुरी: 2014-2017 के बीच एप्स्टीन के कैलेंडर में पुरी (अब पेट्रोलियम मंत्री) के साथ कई अपॉइंटमेंट्स। एक ईमेल में नाम का जिक्र, जिससे भाजपा-कांग्रेस में झड़प हुई।
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, जिनका नाम एप्स्टीन की कम्युनिकेशंस में आया।
- दीपक चोपड़ा: 2016-2018 में एप्स्टीन से ईमेल एक्सचेंज, जिसमें एक मुकदमे पर चर्चा। चोपड़ा ने गहरे संबंधों से इनकार किया, लेकिन भारत में उनकी छवि प्रभावित हुई।
दीपक चोपड़ा, नवीनतम रिलीज में ईमेल्स से जुड़े।
- अन्य उल्लेख: अनिल अंबानी जैसे नामों पर अटकलें, लेकिन पुष्टि नहीं। कुल मिलाकर, भारतीयों से अपराधों का कोई सबूत नहीं, लेकिन राजनीतिक विवाद पैदा हो रहा है।
एप्स्टीन का व्यापक नेटवर्क बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप, प्रिंस एंड्र्यू और बिल गेट्स से जुड़ा था, लेकिन भारतीय लिंक्स घरेलू राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं।
मौत के बाद का विकास और भारतीय प्रतिक्रियाएं
एप्स्टीन की मौत के बाद उनकी संपत्ति से पीड़ितों को मुआवजा मिला, घिसलेन मैक्सवेल को सजा। भारत में 2025 फाइल्स रिलीज से कांग्रेस नेताओं ने जांच की मांग की, जबकि भाजपा ने इसे निर्दोष बताया।
बैंक्स जैसे जेपीमॉर्गन से सेटलमेंट्स जारी, लेकिन भारत में बहस नेताओं को झूठे आरोपों से बचाने पर है।
दिसंबर 2025 में एप्स्टीन फाइल्स भारतीय राजनीति क्यों हिला रही हैं?
ट्रंप द्वारा 19 नवंबर 2025 को साइन किया गया एप्स्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट कल (19 दिसंबर) को जांच दस्तावेज रिलीज करने का आदेश देता है। हालिया हाउस ओवरसाइट रिलीज में भारतीय नामों वाले ईमेल्स और फोटोज से भाजपा-कांग्रेस में तकरार बढ़ी।
भारत में संसदीय चर्चा की मांग हो रही है, विपक्ष मोदी सरकार में विदेशी हस्तक्षेप पर सवाल उठा रहा है।
अंतिम विचार
भारतीय नजरिए से एप्स्टीन घोटाला वैश्विक एलीट नेटवर्क्स के खतरों की चेतावनी है। भारतीय नेताओं पर कोई गलती साबित नहीं हुई, लेकिन खुलासे लोकतांत्रिक साख बचाने के लिए पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। कल फाइल्स रिलीज से हवा साफ होगी या विभाजन बढ़ेगा? कमेंट्स में अपनी राय शेयर करें।